अब बबुआ मंत्री कैसे बनेंगे! बेटे को सेट करने चले थे कुशवाहा, BJP ने दी चेक एंड मेट

Updated on 29-04-2026 12:33 PM
पटना: राजनीति के चतुर खिलाड़ी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा आखिर परिवारवाद की राजनीति में फंस गए या फिर अपने ही बुने जाल में उलझ गए? पूर्व स्वास्थ मंत्री मंगल पांडेय के सिवान विधानसभा चुनाव में मिली जीत के बाद इन्हें एमएलसी पद से इस्तीफा देना पड़ा। इनकी खाली एमएलसी की सीट पर राजनीति के तरह-तरह के किस्से परवान पाए। इनमें एक किस्सा तो ये था कि उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को मंगल पांडेय वाली सीट देकर उनके मंत्री पद को बनाए रखा जाएगा और वे मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के मंत्रिपरिषद में आरएलएम की तरफ से दीपक प्रकाश को शपथ दिलाई जाएगी। लेकिन, इस किस्से पर पूर्ण विराम तो मंगलवार को ही लग गया, जब बीजेपी आलाकमान ने मंगल पांडेय की जगह वर्षों से कार्य कर रहे अरविंद शर्मा को एमएलसी के लिए नॉमिनेट कर दीपक प्रकाश का रास्ता ब्लॉक कर दिया।


उपेंद्र कुशवाहा का डिमांड पर डिमांड वाला 'खेला'

बिहार विधान सभा चुनाव 2025 याद कीजिए, तब उपेंद्र कुशवाहा ने तब 10 से 15 सीटों की डिमांड की थी। फिर जब इन्हें दिल्ली (बीजेपी) बातचीत के लिए बुलाया तो उन्होंने बिहार की राजनीति में कुशवाहा वोट के महत्व को समझाया। बीजेपी आलाकमान ने तब ये कहा था हम अपने एलाइज से चर्चा कर बताते हैं। बाद में बीजेपी आलाकमान ने राष्ट्रीय लोक मोर्चा को पांच सीटों पर लड़ने की सहमति दी। अब बीजेपी ने मंगल पांडेय वाली सीट से अरविंद शर्मा को उम्मीदवार बनाया है।
उन्होंने फिर से आलाकमान के पास जाकर दो एमएलसी पद की डिमांड की। मगर, उपेंद्र कुशवाहा को एक एमएलसी पद का आश्वासन दिया गया। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा का सीटों की संख्या की बारगेनिंग अभी समाप्त नहीं हुई थी। भाजपा आलाकमान ने जब हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा को 6 सीटों पर चुनाव लड़ने की हरी झंडी दे दी, तो उपेंद्र कुशवाहा फिर एक बार अपनी नाराजगी प्रकट कर दी तो बीजेपी ने छह सीटों पर उपेंद्र कुशवाहा को चुनाव लड़ने की इजाजत दे दी।

बीजेपी को आरएलएम के परफॉर्मेंस से निराशा हुई

ये दीगर की वर्ष 2025 विधानसभा चुनाव में एनडीए को बंपर सीट मिला। मगर, उपेंद्र कुशवाहा के नेतृत्व में लड़ी राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उम्मीदवार को बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली। राष्ट्रीय लोक मोर्चा ने बिहार में 6 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवारों को उतारे। इनमें बाजपट्टी, मधुबनी, सासाराम, दिनारा, उजियारपुर और पारु शामिल हैं। पारू वो सीट है, जिसे सबसे बाद में भाजपा ने अपने कोटे से दी थी और ये लगभग जीती हुई सीट बीजेपी ने रालोमो को दी और इस सीट पर हार हुई।

क्या अपने चतुर चाल में फंसे उपेंद्र कुशवाहा?

मंत्रिमंडल गठन जब होने लगा तो उपेंद्र कुशवाहा ने अपने जीते हुए विधायकों को मंत्री न बना कर एक बड़ी चाल चल दी। परिवारवाद के फेर में पड़ कर उन्होंने अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बना डाला। इसको लेकर पार्टी के तीन विधायक ने एक तरह से विद्रोह ही कर दी। परिवारवाद के दायरे में आरोप भी लगाए। लेकिन उपेंद्र कुशवाहा को पता था कि पांच से छह सीट लेने के बाद एमएलसी का एक पद नहीं मिलेगा।

इसलिए, आनन-फानन में उन्होंने अपने बेटे दीपक प्रकाश को इसलिए मंत्री बनाया कि वे किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। इसलिए मंत्रिपद बचाने के लिए एक एमएलसी पद मिल जाएगा। मगर, बीजेपी ने अरविंद शर्मा को विधान परिषद के लिए नामित कर उपेंद्र कुशवाहा की मुश्किलें बढ़ा दी है।

बेटे के लिए ऑप्शन की तलाश में कुशवाहा

अब ऐसे में उपेंद्र कुशवाहा के पास विकल्प सीमित है। बिहार के राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राष्ट्रीय लोक मोर्चा का बीजेपी में विलय करा दें तो 9 सीटों पर एमएलसी के होने वाले चुनाव में दीपक प्रकाश को विधान परिषद के लिए नामित कर दे। या फिर, दोस्ती निभाने के लिए पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी एक सीट पर दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेज दें। हालांकि, रालोमो के गलियारों में ये चर्चा है कि दीपक प्रकाश को पूरे 6 साल वाले एमएलसी के पद पर जाना है। आलाकमान से बात हो गई है।

उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक की करियर क्यों फंसी हुई है?

दीपक प्रकाश ने नवंबर 2025 में बिना विधायक या विधान परिषद सदस्य रहे मंत्री पद की शपथ ली थी।
दीपक को 6 महीने के भीतर (यानी मई 2026 तक) किसी भी सदन का सदस्य बनना जरूरी था।
अब नीतीश सरकार नहीं रही तो एमएलसी बनने की बाध्यता खत्म हो गई। मगर, सदन का सपना तो है।
मंगल पांडेय के इस्तीफे से खाली हुई विधान परिषद की सीट पर चर्चा थी लेकिन दीपक को नहीं मिली।
बीजेपी ने अपने पुराने कार्यकर्ता अरविंद शर्मा को उम्मीदवार बनाकर दीपक प्रकाश का रास्ता ब्लॉक किया।
उपेंद्र कुशवाहा की अपनी पार्टी (RLM) के लिए अतिरिक्त सीट हासिल करने की गेम फिलहाल कम हो गई।
दीपक प्रकाश की नियुक्ति पर शुरुआत से ही एनडीए सरकार पर 'परिवारवाद' के आरोप लग रहे थे।

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